Monday, 24 October 2016

हवाओं की खुशबू में है

जिसे खोजती रहीं निगाहें वो मेरे पहलू में है
आईना वही तो दिल का जो मेरी आरजू में है
मुस्कराने लगी ये कायनात देख अदायें उसकी
वो तो गुलशन की झूमती हवाओं की खुशबू में है
------ नीरु

Friday, 7 October 2016

जीवन-सुधा की खोज़

   भारत देश ने अपनी आजादी के तो सत्तर साल पूरे कर लिये मगर भारतवासियों की सदियों से चली आ रही मानसिक गुलामी की बेड़ियां तो देश को अभी भी जकड़े हुए हैं | वास्तव में स्वतंत्रत होने का क्या अर्थ होता है यदि हम इस पर विचार करें तो अधिकांशत: मंहगे कपड़े, चमचमाती मंहगी गाड़ियां , देर रात तक सैर-सपाटा, मौज-मस्ती , शराब, शबाब और सिगरेट जैसी अनेक विसंगतियां उभरकर सामने आती हैं, किसी यक्षप्रश्न की तरह जिनके जवाब हम सबको तो मालूम ही होगा |
  आज के चरम पर स्थित आदिम प्रवृत्ति में पुरुषवादी अहं के प्रतिउत्तर में महिलाओं का विद्रोही कदम अनायास उसी ओर बढ़ता जा रहा है जो कि सामाजिक-पारिवारिक दृष्टिकोण से शोभनीय तो नही माना जा सकता किंतु कोई ये कहे कि स्त्रियों के प्रति अत्याचार में केवल स्त्रियां ही जिम्मेदार होती हैं तो ये बात पूरी तरह सत्य तो नही मालूम होती क्योंकि अश्लीलता के चक्रव्यूह में उन अबोध बच्चियों का क्या दोष होता है जिन्हें या तो कोख में ही मार दिया जाता या फिर जन्म लेने के बाद भी बलात्कार जैसी भयावह त्रासदी का भय आजीवन रहता है |
  सुनने -पढ़ने में अधिकतर यही आता कि सारे बंधन , नियम जिनकी व्याख्या हर कोई अपनी इच्छानुसार करता रहता है वो केवल स्त्री जाति के लिए ही बनाये और जबरन लागू कराये जाते रहे हैं , तो क्या ये नही महसूस होता कि वर्तमान में कौन सी जाति , धर्म , वंश, लिंग, रुप-रंग आदि का भेद रह गया है जिसे किसी घटना या दुर्घटना का भय नही सताता हो |
   सतयुग में सत्य की प्रबलता रही तो स्त्री-पुरुष दोनों की बुद्धि संयमित आचरण , व्यवहार के रुप में सहयोगी रही, सभी नीति-नियम भी स्वाभाविक ही रहे सबके लिये किंतु जैसे जैसे समय बदलता गया वैसे वैसे बुद्धि भी बदलते हुए आज दुर्बुद्धि के रुप में सब पर हावी हो गयी है | किसी के हाथ की पांचों उंगलियां बराबर नही होती तो क्या ये नही मानना चाहिये कि हर जीवित प्राणी का अपना व्यक्तित्व, समझ , और व्यवहार होता है जिसमें हमें मिलजुल कर सामाजिक व्यवस्थाओं का पालन सबके हित के अनुसार ही संयमित होकर करना चाहिये |
  भारतीय साहित्य , वेद- पुराण विश्व की प्राचीन , अनेक भाषाओं की जननी संस्कृत भाषा में लिखे गये जो कि सुरक्षित रखे जाने की दृष्टि से उपयोगी रहे क्योंकि संस्कृत वैज्ञानिक भाषा है तो अध्यात्म भी विज्ञान ही है एवं जीवन के लिये संजीवनी समान है | भारतीय ज्ञान -विज्ञान से सारा संसार लाभ लेता रहा सदियों से किंतु विडम्बना ये है कि हम भारतीय आज भी आपस में ही उलझते रहते हैं |
   महाराज़ मनु ने अपनी प्रजा को " यत्र नार्यंस्तु पूज्यंते , रमंते तत्र देवता " इन पंक्तियों के माध्यम से यही संदेश दिया कि समाज में नारी को सम्मान्य और पूज्य स्थान देकर जब पुरुष की सहायक शक्ति के रुप में स्थान दिया जाता है तो समृद्धि , यश, सुख-शांति आदि से जीवन सर्वकल्याणकारी एवं उन्नतिमूलक रहता है |
  पुरुष हो या स्त्री , कोमलता , सहिष्णुता को निर्बलता का प्रतीक मानकर शोषण करने के षडयंत्र तो रचे ही जाते  रहे हैं जिसकी पृष्ठभूमि सदियों से लिखी जाती रही तो यहां ये कहना उचित ही होगा कि क्या माँ के सिवा विश्व में कोई और शक्ति है जो शिशु का लालन -पालन, पोषण कर सके , हमारे भारत देश के पौराणिक ग्रंथों में नारी को लेकर ही नही बल्कि पूरी मानव जाति या कि संपूर्ण सृष्टि के लिए हितकारी भविष्य के लिए शुभकामना रुपी मंत्रोल्लेख हैं किंतु कहते हैं कि नकल करने से अक्ल नही आती लेकिन अक्ल हो तो नकल की जरुरत ही नही होती है | सीखने की तो कोई उम्र ही नही होती मगर अधिक मिठाई में कीड़े तो अधिक सिधाई पर आरी चलती रहती है इसलिए जरुरत से ज्यादा भोलापन या चालाकी दोनों ही बुद्धि को भ्रमित करके भृष्ट आचरण को बढ़ावा देती है |
  प्राचीनकाल से ही नारियां घर-गृहस्थी के साथ ही समाज, राजनीति, धर्म, कानून, न्याय जैसे सभी क्षेत्रों पुरुषों की सहायक, प्रेरक की भूमिका में रहीं हैं इसी संदर्भ में आचार्य चतुरसेन शास्त्री के विचार उल्लेखनीय हैं कि " नारी पुरुष की शक्ति के लिए जीवन सुधा है | त्याग, सहनशीलता, प्रेम तो उसके स्वाभाविक गुण हैं "| सृष्टि के संतुलन के लिए एक ही शक्ति को दो भागों में मैथुनी सृष्टि के निर्माण , संचालन आदि के लिए किया गया जिसको नर-मादा या पुरुष और नारी कहा जाता है |
  ऋग्वेद के नासदीय सूक्त ( अष्टक 8, मं० 10 , सू० 129 ) में वर्णन किया गया है कि संसार की उत्पत्ति जल से हुई है , जल का ही एक पर्यायवाची है "नार" | जब शिशु गर्भ में होता है तो उसके जीवन के पोषण के लिए माँ के रक्त से गर्भनाल द्वारा पोषक आहार मिलता है तथा जन्म के पश्चात माँ का स्तनपान शिशु के सर्वांगीण विकास के लिए अमृत समान होता है अतः महादेवी वर्मा जी की लेखनी से उद्भूत पंक्तियां महत्वपूर्ण हैं कि - " नारी केवल मांसपिण्ड की संज्ञा नही है , आदिम काल से लेकर आज विकास पथ पर पुरुष का साथ देकर उसकी जीवन यात्रा को सफल बनाकर उसके अभिशापों को स्वयं झेलकर अपने वरदानों से जीवन को अक्षय शक्ति से भरकर मानवी ने जिस व्यक्तित्व चेतना का विकास किया है , उसी का पर्याय नारी है |"
   यह संसार ही द्वंद्वात्मक , मिथुनजन्य सृष्टि है जिसमें समस्त पदार्थ , स्त्री-पुरुष , शक्ति और सामर्थ्य के रुप विभाजित किये गये हैं , परस्पर दोनों के बीच आकर्षण शक्ति तो संसार का मूलाधार है क्योंकि पुरुषार्थ के चार भागों में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का विधान है तो ऐसे में केवल काम की प्रबलता एवं नारी शक्ति को केवल भोग-विलास की वस्तु समझना क्या  विनाशकारी नही कहा  जा सकता है ?  क्या ये नही लगता कि संयम और संस्कार को यूं ही दरकिनार करके धनलिप्सा, दिखावा, झूठ, स्वार्थ , प्रपंच, ईर्ष्या की प्रबलता में हम अपनी अगली पीढ़ियों को कुंठा की आग में झुलसने की राह दिखाते जा रहे हैं , हम सबको संयम और संस्कार के अमृत-कलश की छलकती बूंदें बनकर अपनी आने वाली पीढ़ियों के साथ मिलकर जीवन-सुधा की खोज़ में वर्तमान से भविष्य की रुपरेखा को आकार देकर इंद्रधनुषी रंग भरने की यात्रा तो तय करनी ही होगी |
------ नीरु ' निरुपमा मिश्रा त्रिवेदी'

Tuesday, 20 September 2016

सुखद भविष्य का अनुष्ठान ( पितृपक्ष)

अध्यात्म की भाषा में यदि कहा जाये तो मृत्यु के पश्चात् वीतरागी आत्मा संसार से मुक्त होकर ईश्वरीय शक्ति के स्वरुप में समाहित हो जाती है किन्तु राग-विराग , मोह-माया , दु:ख -सुख, वैमनस्य  आदि अनेक प्रकार की  इच्छाओं- आकांक्षाओं के वशीभूत होकर पुनर्जन्म के माध्यम से अपनी काम्य वस्तुओं एवं प्रिय लोगों के चतुर्दिक् अपने नवजीवन के लिए अनुकूल परिस्थितियों की तलाश करती है |
     यह प्रश्न सदैव शाश्वत रहा है कि क्या पितृपक्ष में हमारे पूर्वजों को जो कि भौतिक शरीर को त्याग चुके हैं , उन्हें सम्पत्ति , भोजन, कपड़ों आदि की आवश्यकता होती होगी, यदि मृत देह से विमुक्त स्वतंत्र विचरित आत्मा को समय और स्थान से परे कहीं दूर किसी नवीन आयाम में रहना सुनिश्चित है तो वंशजों द्वारा श्रृद्धापूर्वक भावअर्पण के विभिन्न उपादानों एवं क्रियाकलापों से प्रसन्नता तो जरुर मिलती होगी|
      पितृ-ऋण से मुक्ति के विधान के लिए विवाह-संस्कार की रीति निर्धारित की गई है , यहां पर गौरतलब है कि विवाह की रीति निभाने के लिए पहले पांच तत्वों से निर्मित भौतिक शरीर में उपस्थित प्राणस्वरुप आत्मा को पांच तत्वों से बने इस ब्रह्माण्ड में व्याप्त जीवन के लिए आवश्यक पांच तत्वों अर्थात् मिट्टी , पानी,आग, आकाश, और हवा में समाहित प्राणशक्तियों  का आह्वान करके परम सत्ता परमात्मा के रुप में मिलन या स्थापित कराया जाता है फिर दो स्थूल शरीरों का मिलन पूर्वजों के उद्धार के लिए संतानोपत्ति आदि के नियमों के लिए किये जाने का विधान है | पति अर्थात् सम्मान और पत्नी उस सम्मान को बनाये रखने वाली शक्ति तो संतान का अर्थ है सम- सम्यक एवं तान- विस्तार अतः पितृऋण का वास्तविकअर्थ तो यही है कि परिवार -भाव के प्रति दायित्व का बोध |
       कोई भी जीव या मानव स्वयं में सम्पूर्ण नहीं हो सकता है , वह परिवार से ही संयुक्त इकाई बनता है तो परिवार से ही ये संसार भी बना है इसीलिए ये संसार भी एक परिवार जैसा होता है, हमारे हाथों की जब पांचों उंगलियां ही बराबर नही होती तो संसार में विवेकवान जीव की श्रेणी में माने जाने वाले मानव जाति के स्वभाव में समानता अकल्पनीय है, जिसकी जैसी समझ उसका वैसा विचार , जिसके जैसे विचार उसका वैसा ही कर्म और व्यवहार होता है |
     हिंन्दू धर्म में परिवार को समाज की सबसे छोटी इकाई के रुप माना जाता है अतः हर व्यक्ति किसी न किसी पारिवारिक रिश्ते की डोर से जुड़कर सामाजिक इकाई के पूरक के रुप में मैत्री भाव की स्थापना करता है , यही भावना विस्तृत रुप में भातृत्व भाव की परम्परा को स्थापित करती है जिसमें व्यक्ति पूरे विश्व को ही अपना परिवार मानने लगता है , उसके लिए कोई अपना-पराया नही रह जाता है , वह हर चर-अचर जीव जगत को गुरु मानता है |
     धर्म तो धारण करने की रीति जैसा ही है , धार्मिक भावनायें केवल भविष्य की सुखद आशायें उपजाती हैं जिनमें बीते हुये सुख-दुःख आदि के स्मरण का विधान नही बल्कि स्थूल शरीर को अग्नि या किसी जलप्रवाह को अर्पित करके भाव- शरीर को स्मरण करके सच्ची श्रृद्धांजलि देने के धार्मिक विधान सुनिश्चित किये गये हैं और सुखद उज्जवल भविष्य की नींव संजोई गई है| पितृऋण के संदर्भ में एक मंत्र उल्लिखित है कि -----
     ऊँ गोत्रन्नों वर्द्धतां दातारो नोSभिवर्द्धन्तां वेदाः सन्ततिरेव च|
     श्रद्धा च नो मा व्यवगमद् बहुदेयं च नोस्तु |
     अन्नं च नो बहु भवेदतियींश्च लभेमहि |
     याचिताश्च न: सन्तुमा च यानिष्म कंचन |
     एता: सत्या: आशिष: सन्तु |
अर्थात् हमारा गोत्र बढ़े,हमें देने वाले देवता बढ़ें , वेद-रुप ज्ञान की वृद्धि हो | श्रृद्धा मुझसे कभी अलग न हो , सदा अतिथि के सत्कार का लाभ पायें, हमसे लोग मांगने वाले हों,हमें किसी से मांगना न पड़े, ये मंगलकामनायें पूरी हों |
      पूजन विधियों में सदैव गोत्र का नाम स्मरण किया जाता है जो कि रक्त संबंध के परिचय के लिए आवश्यक माना जाता है जिसमें पूर्वजों की परम्परा, शौर्य, सद्गुण, सद्भावनायें आदि सम्मिलित होती हैं अतः पूर्वजों के रक्त के परिचायक बने रहने हेतु वंशजों को अपने भाव कर्मों आदि का उचित एवं सबके हित को ध्यान में रखते हुए पालन करना होता है, लेकिन जिस प्रकार ईश्वर को भी किसी ने नही देखा बल्कि ईश्वरीय शक्तियों को किसी न किसी मानवरुप में ही देखा , समझा और पूजा जाता रहा है वो केवल भावनाओं, कर्मों, बुद्धि , समझ, विचार और व्यवहार पर ही निर्भर होता है कि जिस भी मनुष्य या किसी जीव ने जगत कल्याण के लिए सद्भावनाओं की रक्षा अपने प्राणप्रण से की है वह किसी भी रुप-रंग , जाति -धर्म, लिंग, आदि में जन्मा हो वह देवस्वरुप साक्षात गुरु के रुप में परखा जाता  और अनुकरणीय हो जाता है |
     इसप्रकार किसी भी धर्म के विभिन्न उपादानों , मान्यताओं में मात्र सुखद भविष्य की कल्पना एवं कामना ही होती जो कि व्यक्ति में उसकी सामर्थ्य , बुद्धि, विचार , भावना, व्यवहार और कर्मों से विस्तार करके लोककल्याण में पूर्णत: समर्पित हो जाती है इसके लिए गृहस्थ आश्रम का त्याग जरुरी तो नही मगर सर्वसहमति भी आवश्यक समझी जाती रही है किन्तु वसुधैव कुटुम्बकम् की अवधारणा भी कोरी कल्पना नही है बल्कि अपरिहार्य एवं सर्वसाध्य होती है |
------- नीरु ' निरुपमा मिश्रा त्रिवेदी '

Sunday, 11 September 2016

दिल्ली से प्रकाशित " अनंतवक्ता" पत्रिका में प्रकाशित लेख " समाज का स्वरूप और स्त्री "

आज के समय की जीवनशैली में स्त्री-पुरुष दोनों को ही घर से लेकर बाहर तक की हर जिम्मेदारी बराबर साथ-साथ निभानी पड़ रही है तो ऐसे में यदि नारी स्वयं अपने महत्व को नही समझेगी तो भला और कोई क्यों समझना चाहेगा तथा भले ही हर पुरुष समाज में खुले तौर पर नही स्वीकार करता हो लेकिन प्रत्येक पुरुष यह तो जानता ही है कि अगर नारी नही होगी तो पुरुष भी नही होगा , क्योंकि दोनों का अस्तित्व दोनों के होने से ही है 

सन् 1999 में लड़कों के मुकाबले भारत में लड़कियों की संख्या प्रति 1000 लड़कों के मुकाबले लड़कियों की संख्या 945 लड़कियों से घटते-घटते सन् 2011 में 918 ही रह गई है जो कि कोई मामूली या छोटी समस्या नही है, इसके साथ ही आर्थिक परिदृश्य पर रोजगार के मामलों में भी गांवों , कस्बों में 30 % तो शहरों में 20 % ही है | 

 महिला सशक्तिकरण की दिशा में केंद्र सरकार द्वारा चलाई जा रही कई योजनायें मील का पत्थर साबित हो सकती हैं - सामाजिक योजनाओं में (१) एकीकृत बाल विकास योजना के तहत मिशन इंद्रधनुष टीकाकरण (२) आई०सी०डी०एस० के तहत सम्पूर्ण पोषण की व्यवस्था (३) राजीव गाँधी किशोरी सशक्तिकरण योजना सबला (४) अवैध मानव तस्करी रोकने के लिए उज्जवला योजना (५) मुसीबत में फंसी लड़कियों , महिलाओं के आश्रय के लिए वर्षों से संचालित स्वाधार गृह योजना , तथा इसके साथ ही शैक्षिक योजनाओं में हैं - (१) बेटी बचाओ- बेटी पढ़ाओ योजना (२) कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय, एवं आर्थिक योजनाओं में हैं (१) जन्म से दस वर्ष की लड़कियों का खाता खोलने के लिए (१) सुकन्या समृद्धि योजना (२) सन् 1986-87 से संचालित लड़कियों के कौशल विकास के लिए "स्टेप प्रोग्राम | 

Saturday, 27 August 2016

रंग में रंग मिलता गया

आपके प्यार में खो गये
इश्क में रतजगे हो गये

दर्द भूले सभी खो गये
प्यार के काफिले हो गये

ठीक था होंठ चुप ही रहे
बात से जलजले हो गये

बात में बात जुड़ती गई
बात से फलसफ़े हो गये 

रंग में रंग मिलता गया
इश्क में सांवले हो गये

बात कुछ खास है प्यार में
खोट भी अब खरे हो गये

लोग कहते शराफ़त गई
हम बहुत मनचले हो गये
----- नीरु ' निरुपमा मिश्रा त्रिवेदी'

अभी राज़ अपना बताया नही है

अभी प्यार हमने जताया नही है
अभी हाल दिल का बताया नही है

बहुत ख्वाब देखा निगाहों से ओझल
अभी आँख में सब सजाया नही है

रुके जो नही है हमारी निशानी
अभी चाल अपनी दिखाया नही है

कई कर्ज़ बाकी अभी जिंदगी पर
सभी फर्ज़ हमने निभाया नही है

सुनों दिल कहीं कह गया क्या किसी से
अभी गीत हमने सुनाया नही है 

ज़रा थाम लूं मैं बहक ही न जाओ
अभी ज़ाम हमने पिलाया नही है

तराने बहुत दिल सुनाता कहानी
अभी राज़ अपना बताया नही है
------ नीरु ' निरुपमा मिश्रा त्रिवेदी '

Wednesday, 24 August 2016

तू खुदा हो गया

देखते आपको इक नशा हो गया
प्यार दिल ने किया तू खुदा हो गया

आजकल रात से बात होने लगी
फिर सुबह का पता बावरा हो गया

हम कहें क्या इसी सोच में रह गये
प्यार की इक अदा सांवरा हो गया

इक हमारे नही हो सकेंगे वही
दिल हमारा किसी पर फिदा हो गया

बात कुछ खास हममें कहीं तो रही
दूर होते हुए सिलसिला हो गया

सामने आप हों तो खुशी मिल गई
दूर जाते हुए दिल अनमना हो गया

देखिये गौर से "नीरु"  तस्वीर में
दर्द देेेकर वही फिर दवा हो गया 

---- नीरु ( निरुपमा मिश्रा त्रिवेदी)

Sunday, 14 August 2016

दवा दिल की पीर के

जो चल पड़ेंगे अंधेरों को चीर के
दवायें  बनेंगे वही  दिल की पीर के

हैं भूलनी पीड़ा तो सब प्रथायें सड़ी -गली 

अब बनेंगी जिंदगी की परिभाषायें नई -नई

होंगे नही  फकीर हम किसी लकीर के
जो चल -----
वही बनेंगे------

खुशी टूटे दिल की , मिली नज़र को रोशनी

गुमसुम खोयेगी  कब चार दिन की चाँदनी 

बनकर  ग़ज़ल-गीत रहना है नज़ीर  के
जो चल-------
वही बनेंगे------

हो जाये  कितना भी कद ये खजूर तो नही 

आँसू किसी आँख में हमें मंजूर तो नही 

छाया  भी मिले नही क्यों  राहगीर के 


जो चल पड़ेंगे अंधेरों को चीर के 
दवायें वही बनेंगे दिल की पीर के 
------- नीरु


Sunday, 5 June 2016

अर्धनारीश्वर

सामर्थ्य
सृजनशक्ति
पुरुष और प्रकृति,
आँखें देखती
बाहर तो
अकेलापन
अधूरापन,
अपने भीतर
झांके
पहचाने
तो एकांत
विवेक-बुद्धि
सद्बुद्धि,
मनन
मन
नमन,
शक्ति का प्रयोजन
अधूरा
जब तक नही है
शिवम्,
सारतत्व यही जीवन का
सत्यम्, शिवम्,सुंदरम्
जगत- ईश्वर
अर्धनारीश्वर,
वसुधैव कुटुम्बकम्
- निरुपमा मिश्रा ( नीरू)

Friday, 1 April 2016

नववर्ष

कितनी सहजता से
तारीखों के
बदलते ही
कैलेंडर
बदल जाते ,
समय- परिस्थितियां
भी
बदल ही जाते,
माटी के तन
में एक मन
जो इन सबके बीच
समेटते- सहेजते
बनते- बिगड़ते
एक जैसा
कहां रहता,
बदलाव की प्रक्रिया में
सकारात्मक
सृजनात्मक
रहने के लिए
ज्ञान- विवेक
बनाये रखना
आसान तो नही,
जटिल जीवन की
शक्तिशाली मन की
सरलता- सहजता को
श्रेष्ठ दिशागत
प्रवाह की ओर
आइये मिलकर ले चलते
आशाओं-उम्मीदों से
नव वर्ष की ओर
साथ-साथ चलते
----- निरुपमा मिश्रा (नीरू)
नव वर्ष विक्रम संवत २०७३ की हार्दिक शुभकामनायें

Wednesday, 23 March 2016

रंग दे बसंती चोला

भर दे
मन की पिचकारी
भारत माँ
दुलारी,
तीन रंग में
होती
होली,
विश्व गुरु
बनकर लहराये
तिरंगा - हिंदुस्तान
देश के लिए
तन मन धन
सब
हो जाये
कुर्बान
----- निरुपमा मिश्रा

Tuesday, 22 March 2016

होली

चहक उठी है सृष्टि सलोनी मोहक सिर पर ताज़
महकती हवा के पंख लगाकर मन तो झूमें आज
आज देखकर  मनमोहन को  ये नयन शरमाये
मन के द्वार पर मुस्काये सजना बावरे आज
----- निरुपमा मिश्रा

Tuesday, 8 March 2016

स्त्री - धर्म

स्त्री
जीवन को धारण
पालन- पोषण करती,
धर्म
जीवन जीने की
अनुशासित - प्रेरक
जीवन शैली,
स्वीकार होते दोनों आसानी से,
तर्क- कुतर्क से परे
जिन्हें अपनाया जाता रहा,
फिर क्यों
कुंठित होते अनियंत्रित
जीवन को देखकर
मन घबराता रहा,
स्त्री धर्म तो हर कोई बताता रहा,
पुरुष अपना धर्म निभाने से क्यों
कतराता रहा,
स्त्री अपनी कोख में
जीवन को धारण करती,
अपने जीवन में
सबके वर्चस्व को
स्वीकार करती ,
घर, परिवार, संसार
के बीच अनगिनत
जिम्मेदारियों को
सरलता से अपनाती,
फिर किस धर्म- अधर्म
की परिभाषा में स्वयं स्त्री ही
खुद को
इंसान समझने- समझाने
का धर्म भूल जाती,
धर्म
तो इंसानियत का ही
दुनिया में है रह जाना,
स्त्री - पुरुष
सबको होगा साथ -साथ
आगे आना
कि
बहुत जरूरी
धर्म
इंसानियत का निभाना
------ नीरु 'निरुपमा मिश्रा त्रिवेदी'

Sunday, 6 March 2016

महाशिवरात्रि पर्व की शुभकामनायें

शक्ति का प्रयोजन अधूरा
जब तक नही है शिवम्
सारतत्व यही जीवन का
सत्यम्, शिवम्, सुंदरम्
--- नीरू

Saturday, 13 February 2016

बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनायें

भावना सरल प्रीत की,करुणा, विवेक, ज्ञान
सृष्टि सुंदरता निखरे, जीवन हो आसान
--- निरुपमा मिश्रा

Tuesday, 26 January 2016

गणतंत्र दिवस की शुभकामनायें

फिर उजाले से हमें धोखा हुआ है क्यों भला
साँप जैसे कौन ये लिपटा हुआ है क्यों भला
गोद सूनी,माँग सूनी , बुझ गया रोशन दिया
चल रही सरहदों पर बेरहम ये हवा है क्यों भला
------ निरुपमा मिश्रा " नीरू"