Friday, 11 August 2017

तेरी वापसी

                                            तेरी वापसी

                                       जूही , चमेली,कचनार
                                चंपा,बेला और हरसिंगार के फूल
                                        महक उठे फिर
                                        दिवस मास नहीं
                                 ऐसा लगा कि सदियों बाद
                                        तेरी वापसी हुई,

                                        घोंसले में चिड़िया
                                        गमकती, लरजती हवा
                                 अंधकार में ,तल-अतल में डूबी
                                        दिशाओं में रोशनी और

                                           सूखी पड़ी नदी में
                                               जल की नहीं
                                    तेरी और तेरी ही वापसी हुई,

नीले आकाश में सूरज-चाँद-सितारे
दिशायें खोजते पंछियों
और सात रंगों वाले 
इंद्रधनुष की वापसी नहीं
न जाने कितने और कितने ही दिनों बाद
तेरी और बस तेरी ही वापसी हुई
----- नीरु ( निरुपमा मिश्रा त्रिवेदी) 

Monday, 19 June 2017

रंग अपने बचपन के

रंग बदलती हुई दुनिया में, रंग अपने बचपन के
उम्र भले ही कितनी होगी, दिल दो रहने बचपन से
दुनियादारी के चक्कर में, ख़ुद को भी हम भूल गये
हमसे हमको मिलवाये, वो ढंग सलोने बचपन के
---- नीरु ( निरुपमा मिश्रा त्रिवेदी)

Wednesday, 31 May 2017

अक्षरों में एहसास के पल

हंसमुख स्वभाव की थी नवधा और उसके पति संयम भी उसी के स्वभाव के जैसे थे | दोनों पति-पत्नी को कहानी, कविताओं, शेरो-शायरी का बहुत शौक़ था, नवधा तो कभी-कभार कहानियां-कविताएं आदि भी लिखा करती जिसके पहले पाठक अक्सर उसके पति ही हुआ करते , नवधा को बचपन से ही लिखने का शौक़ रहा इसलिए वो अपने विवाह के पहले जब भी कुछ लिखा करती तो सबसे छुपा कर अपने माता-पिता, भाई-बहनों को पढ़ाया करती थी, नवधा का परिवार उसके लेखन को सराहता, और भी बेहतरीन लिखने को हमेशा प्रेरित भी किया करता, शादी के बाद उसके ससुराल में भी किसी को उसके लेखन के शौक पर कोई आपत्ति नहीं थी|
    विवाह के बाद कुछ दिनों तक तो नवधा का लेखन का हुनर छिप-सा गया था मगर परिवार वालों की इच्छा के अनुसार और अपने कुछ ख़ास दोस्तों का दिल रखने के लिए नवधा ने समय निकाल कर फिर से लेखनी थामी | एक दिन नवधा अपने रोज़मर्रा के काम-काज़ निपटा रही थी कि आलमारी साफ़ करते समय उसके हाथों में उसके पति की एक पुरानी डायरी लगी तो वो उसके पन्ने पलटने लगी, बीच में गुलाबी स्याही से लिखी प्यार भरी तहरीर पढ़ कर वो सोचने लगी कि ये क्या है , क्या उसके पति की विवाह से पहले कोई प्रेमिका भी रही है ?, लेकिन अपने स्वभाव के अनुरूप नवधा ने वो डायरी उसी तरह वहीं ज्यों कि त्यों रख दी |
   नवधा और संयम की जोड़ी उनके आपसी समझ के कारण बड़ी मशहूर थी, ऊपर से दोनों का एक जैसा स्वभाव भी बहुत लोगों की ईर्ष्या का कारण रहा हमेशा ही, मगर इन सबसे उन दोनों के आपसी  रिश्ते में   कोई खटास नहीं आने पाई कभी | नवधा बहुत सुशील , गुणवान और रूपवान थी जिसके कारण कई बार लोग उसे अपने प्रेम जाल में फसाने को बड़े बेताब हुए लेकिन नवधा पूरी तरह से अपने पति और परिवार को ही समर्पित थी अतः उसके सामने किसी की दाल गलने नहीं पाई  जो कि नवधा के चरित्र के बारे में तरह - तरह की अफवाहों की जन्मदायक भी हुई मगर इन सबसे उसे या उसके परिवार को फ़र्क तो नहीं पड़ता बस कभी-कभी सब उलझ जरूर जाते थे|
   पहले प्यार का एहसास सभी को आजीवन याद रहता है मगर समय के साथ-साथ अपने प्यार को संवारते रहना और परवान चढ़ते देख सन्तोष होना तो कोई नवधा के पति संयम से सीखे  | शाम के वक्त संयम आलमारी में कुछ खोज़ रहा था  उसे परेशान देख नवधा ने पति की मदद करनी चाही तभी वही पुरानी डायरी ज़मीन पर गिर पड़ी |
  नवधा और संयम के बीच में उस पुरानी डायरी के वही पन्ने खुले हुए थे जिसे पढ़ कर नवधा ने उस दिन चुपचाप रख दिया था | खुले हुए पन्नों में पहले प्यार की दास्तान के रुपहले अक्षर अपने एहसास की खुश्बू में भीगे हुए मुस्करा रहे थे कि हड़बड़ाहट में संयम और नवधा दोनों ही डायरी उठाने को झुके और आपस में सिर लड़ा बैठे | "सॉरी", संयम ने कहा तो नवधा बोली कि "क्यों सॉरी", | संयम इसके आगे कुछ बोल न सका , तभी नवधा डायरी के उन्हीं पन्नों को फिर पढ़ने लगी तो संयम ने कहा-" प्लीज़ , आप इसे न पढ़िए," नवधा मुस्कराई -" क्यों न पढूँ मैं इसे, बताइये तो" नवधा को शरारत से मुस्कराते देख संयम शरमाते हुए बोला कि -" ये सब तो बहुत पहले मैंने आपके लिए ही लिखा था और आज ख़ुद आपने ही इसे पढ़ लिया "|

संयम की बात सुन कर नवधा अवाक - सी संयम को देखती ही रह गयी, और संयम के होठों पर विजयी मुस्कान खिल उठी | 
------------------ नीरु ( निरुपमा मिश्रा त्रिवेदी) 

Friday, 28 April 2017

बच्चे मन के सच्चे

"ओह्ह,धूप तो बहुत तीखी है", मधुर, मगर बेबस आवाज़ के पीछे आस-पास बिखरी हुई कई निगाहें, सिमट कर देखने लगीं कि ये किसने कहा| सबने देखा तो जाना ये तो एक मध्यम कद कि सुंदर-सी सांवली सलोनी महिला के मुख से छलकी हुई शब्द लहरी है, जो अपने दो छोटे मासूम बच्चों को लिए बस स्टॉप पर अपने गंतव्य की ओर जाने वाली बस के इंतज़ार में पेड़ों की छाँव ख़ोज़ते पसीने से तर-बतर हुई जा रही थी|
   उस महिला के साथ के बच्चे भी अपनी माँ का आँचल थामें हुए कड़ी धूप से तिलमिला रहे थे, वो कभी अपनी माँ को देखते तो कभी पीछे लगी दुकानों पर टंगे हुये खिलौने आदि, कभी निगाहें दौड़ा कर चिप्स,कुरकुरे और टाफ़िज़ खोजने लगते, माँ से अपनी मांगें मनवाने के लिए बीच-बीच में कुनमुना भी रहे थे मगर माँ कड़ी धूप से अपने बच्चों को बचाने के लिए जल्दी से बस के आने की मन ही मन ही प्रार्थना करने लगी जो कि उसके मुट्ठियों के बंद होने और खुलने के साथ बुदबुदाते होंठों से सभी देखने वालों को साफ़ महसूस हो रहा था|
  बस स्टेशन से सूचना मिलने पर कि बस देर से आएगी क्योंकि रास्ते में ट्रैफ़िक बहुत है ,माँ अपने बच्चों को लेकर बगल के गन्ने वाले जूस की दुकान की छाँव में खड़ी हो गयी और अपने आँचल को बच्चों के सिर पर फैला कर बहती बेहद गर्म हवा से बचाव की कोशिश में लग गयी, इतने में उनकी मुलाकात विद्यालय से लौटती एक शिक्षिका से हुई जो अपने दोनों हाथों में थैला लिए कंधे पर बैग टांगे उनके बगल में आकर खड़ी हो गयी थी|
  अध्यापिका चुपचाप अपने सिर को अपने दुपट्टे से ढंके बच्चों की ज़िद और माँ की मनुहार देख रही थी कि तभी उस महिला के साथ की बच्ची ने अध्यापिका का हाथ थाम कर कहा कि, - "आप थोड़ा-सा झुकिए तो आपके कान में मुझे एक बात बतानी है" अध्यापिका चौंक कर देखने लगी और मुस्करा कर  पूछा "कौन -सी बात" फिर हौले से बच्ची की तरफ़ झुकी|
  " आंटी, ये जो मेरी माँ हैं न , इन्होंने आज मुझे शॉप में न, पर्पल कलर की ड्रेस नहीं दिलवाई " बच्ची ने अध्यापिका के कान में खुसफसाते हुए कहा,अध्यापिका बोली -" अरे' , बच्ची कुछ सोचते हुए फिर बोली कि -" लेकिन मुझे पिंक कलर की ड्रेस दिलवाई ,वो बहुत सुंदर लगती है , सच्ची" ,अध्यापिका बच्ची की बात सुनकर मुस्कराई , -" ये तो बहुत अच्छी बात है न" बच्ची ने अध्यापिका की बात पर अपना सिर हिलाकर मुस्कराती आँखों से हामी भरी कि " हाँ" |
   इसी तरह बच्ची थोड़ी-थोड़ी देर में कुछ सोच-सोच कर अध्यापिका के कान में अपनी बातें कहती और अध्यापिका धैर्यपूर्वक बच्ची की बातों को सुन कर ज़वाब देती, थोड़ी देर में न जाने किस बात पर अध्यापिका और बच्ची जब जोर से खिलखिला उठी तो बच्ची की माँ कुछ झेंपते हुए बच्ची की बांह थामते हुए अध्यापिका से बोली कि ,-" सॉरी आपको मेरी बिटिया बड़ी देर से परेशान कर रही है" , अध्यापिका ने बड़ी ही शालीनता और सहजता से ज़वाब दिया कि, -" ऐसा नहीं है, मुझे कोई परेशानी नहीं, बच्चे तो मन के सच्चे होते हैं, हमें उनकी बातें धीरज से सुननी और समझनी चाहिए ,नहीं तो उनका मन उदास हो जायेगा फिर वो अपनी जिज्ञासाओं का हल खोजने किसके पास जायेंगे, यही बच्चे तो हमारा भविष्य हैं" , अध्यापिका की बात सुनकर माँ के चेहरे पर बहुत ही ममतामयी, अपनत्व भरी मुस्कान खिल उठी,
 तभी बच्ची ने फिर सवाल किया कि-" क्या आप टीचर

मैंम हैं" तो अध्यापिका ने हंसते हुए ज़वाब दिया कि-" हाँ जी, मैं टीचर मैंम ही हूँ और आज से तुम्हारी मौसी भी" | 

------- नीरु (निरुपमा मिश्रा त्रिवेदी)

Friday, 24 February 2017

प्रेम-अगन

जनवरी की कड़कड़ाती ठण्ड के बाद फ़रवरी की गुनगुनाती धूप के आँचल में बसंती पवन की मदमस्त चाल दीवानगी के रोग की एक मशहूर वज़ह पाई जाती है, ऐसे में जनवरी के माह में मकर संक्रांति के त्यौहार में आसमान में उड़नें वाली पतंगों की ओट में नैनों के पेंच इस छत से उस छत पर दिखाई देना बहुत ही मनोरम दृश्य रहता रहा है, ये सिलसिला यूँ ही मार्च महीने के होली के रंगीन नजारों तक अनवरत जारी रहता है |
    वैसे एक बात तो गौरतलब है कि इंसान हो या और कोई जीव सभी के मन को बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के प्रीत का एहसास एक अज़ीब से नशे में डूबने को मजबूर कर देता है, जिसमें चार जोड़ी आँखों की गुस्ताखियों की हमेशा से ही बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका पाई जाती रही है, इन सबमें अक्सर पड़ोसिनें अक़्सर खूबसूरत ही होती हैं और फिर अनेक वज़हों से , कई रिश्तों-नातों की बोलियों-ठिठोलियों की दियासलाई से न जानें कब, कैसे प्रेम -अगन की ज्वाला किसी के भी मन को भीतर ही भीतर जलाने लगे ये कोई नहीं जान सकता|
     ठीक इसी तरह अपनी कुछ उलझनों का हल पाने को बेताब, अनेकों जिज्ञासाओं को लेकर नादिरा ने अपनी सखी राधा से अपनी आवाज़ में हल्का ग़ुस्सा लिए पूछा - " राधा, एक बात मेरी समझ में नहीं आती कि ऐसा क्यों होता है ?"
नादिरा का चेहरा देख नटखट राधा के होंठो पर मुस्कराहट खेल गयी - " कैसी बात नादिरा" राधा ने पुछा |
" यही कि चाहे-अनचाहे ये कमबख्त प्यार-मोहब्बत का टोकरा लिए हर दूसरे दिन कोई न कोई सामने आकर जबरन हाज़िर हो जाता है, क्या बला है ये भी"
नादिरा की बात सुनकर राधा ठहाका मार कर खिलखला पड़ी, बमुश्किल अपनी हंसी को रोकते हुए बोली कि-" अरे मेरी प्यारी सखी, ये इश्क़ है, प्यार है, मोहब्बत है कोई बला नही है री, ये प्रेम वो अगन है जो लगाये न लगे और बुझाये न बुझे, कितने ही रिश्ते , सपनें सब इस अगन में जलकर राख़ हो जाते मगर ये लाइलाज रोग जैसे ही होता है क्योंकि दिल जो होता है न सबका वो तो किसी सूरत में नहीं मानता जी "
दोनों सखियाँ अपनी ही बातों पर हँसते-हँसते लोटपोट होने लगीं |
----- नीरु (निरुपमा मिश्रा त्रिवेदी)

Monday, 24 October 2016

हवाओं की खुशबू में है

जिसे खोजती रहीं निगाहें वो मेरे पहलू में है
आईना वही तो दिल का जो मेरी आरजू में है
मुस्कराने लगी ये कायनात देख अदायें उसकी
वो तो गुलशन की झूमती हवाओं की खुशबू में है
------ नीरु

Friday, 7 October 2016

जीवन-सुधा की खोज़

   भारत देश ने अपनी आजादी के तो सत्तर साल पूरे कर लिये मगर भारतवासियों की सदियों से चली आ रही मानसिक गुलामी की बेड़ियां तो देश को अभी भी जकड़े हुए हैं | वास्तव में स्वतंत्रत होने का क्या अर्थ होता है यदि हम इस पर विचार करें तो अधिकांशत: मंहगे कपड़े, चमचमाती मंहगी गाड़ियां , देर रात तक सैर-सपाटा, मौज-मस्ती , शराब, शबाब और सिगरेट जैसी अनेक विसंगतियां उभरकर सामने आती हैं, किसी यक्षप्रश्न की तरह जिनके जवाब हम सबको तो मालूम ही होगा |
  आज के चरम पर स्थित आदिम प्रवृत्ति में पुरुषवादी अहं के प्रतिउत्तर में महिलाओं का विद्रोही कदम अनायास उसी ओर बढ़ता जा रहा है जो कि सामाजिक-पारिवारिक दृष्टिकोण से शोभनीय तो नही माना जा सकता किंतु कोई ये कहे कि स्त्रियों के प्रति अत्याचार में केवल स्त्रियां ही जिम्मेदार होती हैं तो ये बात पूरी तरह सत्य तो नही मालूम होती क्योंकि अश्लीलता के चक्रव्यूह में उन अबोध बच्चियों का क्या दोष होता है जिन्हें या तो कोख में ही मार दिया जाता या फिर जन्म लेने के बाद भी बलात्कार जैसी भयावह त्रासदी का भय आजीवन रहता है |
  सुनने -पढ़ने में अधिकतर यही आता कि सारे बंधन , नियम जिनकी व्याख्या हर कोई अपनी इच्छानुसार करता रहता है वो केवल स्त्री जाति के लिए ही बनाये और जबरन लागू कराये जाते रहे हैं , तो क्या ये नही महसूस होता कि वर्तमान में कौन सी जाति , धर्म , वंश, लिंग, रुप-रंग आदि का भेद रह गया है जिसे किसी घटना या दुर्घटना का भय नही सताता हो |
   सतयुग में सत्य की प्रबलता रही तो स्त्री-पुरुष दोनों की बुद्धि संयमित आचरण , व्यवहार के रुप में सहयोगी रही, सभी नीति-नियम भी स्वाभाविक ही रहे सबके लिये किंतु जैसे जैसे समय बदलता गया वैसे वैसे बुद्धि भी बदलते हुए आज दुर्बुद्धि के रुप में सब पर हावी हो गयी है | किसी के हाथ की पांचों उंगलियां बराबर नही होती तो क्या ये नही मानना चाहिये कि हर जीवित प्राणी का अपना व्यक्तित्व, समझ , और व्यवहार होता है जिसमें हमें मिलजुल कर सामाजिक व्यवस्थाओं का पालन सबके हित के अनुसार ही संयमित होकर करना चाहिये |
  भारतीय साहित्य , वेद- पुराण विश्व की प्राचीन , अनेक भाषाओं की जननी संस्कृत भाषा में लिखे गये जो कि सुरक्षित रखे जाने की दृष्टि से उपयोगी रहे क्योंकि संस्कृत वैज्ञानिक भाषा है तो अध्यात्म भी विज्ञान ही है एवं जीवन के लिये संजीवनी समान है | भारतीय ज्ञान -विज्ञान से सारा संसार लाभ लेता रहा सदियों से किंतु विडम्बना ये है कि हम भारतीय आज भी आपस में ही उलझते रहते हैं |
   महाराज़ मनु ने अपनी प्रजा को " यत्र नार्यंस्तु पूज्यंते , रमंते तत्र देवता " इन पंक्तियों के माध्यम से यही संदेश दिया कि समाज में नारी को सम्मान्य और पूज्य स्थान देकर जब पुरुष की सहायक शक्ति के रुप में स्थान दिया जाता है तो समृद्धि , यश, सुख-शांति आदि से जीवन सर्वकल्याणकारी एवं उन्नतिमूलक रहता है |
  पुरुष हो या स्त्री , कोमलता , सहिष्णुता को निर्बलता का प्रतीक मानकर शोषण करने के षडयंत्र तो रचे ही जाते  रहे हैं जिसकी पृष्ठभूमि सदियों से लिखी जाती रही तो यहां ये कहना उचित ही होगा कि क्या माँ के सिवा विश्व में कोई और शक्ति है जो शिशु का लालन -पालन, पोषण कर सके , हमारे भारत देश के पौराणिक ग्रंथों में नारी को लेकर ही नही बल्कि पूरी मानव जाति या कि संपूर्ण सृष्टि के लिए हितकारी भविष्य के लिए शुभकामना रुपी मंत्रोल्लेख हैं किंतु कहते हैं कि नकल करने से अक्ल नही आती लेकिन अक्ल हो तो नकल की जरुरत ही नही होती है | सीखने की तो कोई उम्र ही नही होती मगर अधिक मिठाई में कीड़े तो अधिक सिधाई पर आरी चलती रहती है इसलिए जरुरत से ज्यादा भोलापन या चालाकी दोनों ही बुद्धि को भ्रमित करके भृष्ट आचरण को बढ़ावा देती है |
  प्राचीनकाल से ही नारियां घर-गृहस्थी के साथ ही समाज, राजनीति, धर्म, कानून, न्याय जैसे सभी क्षेत्रों पुरुषों की सहायक, प्रेरक की भूमिका में रहीं हैं इसी संदर्भ में आचार्य चतुरसेन शास्त्री के विचार उल्लेखनीय हैं कि " नारी पुरुष की शक्ति के लिए जीवन सुधा है | त्याग, सहनशीलता, प्रेम तो उसके स्वाभाविक गुण हैं "| सृष्टि के संतुलन के लिए एक ही शक्ति को दो भागों में मैथुनी सृष्टि के निर्माण , संचालन आदि के लिए किया गया जिसको नर-मादा या पुरुष और नारी कहा जाता है |
  ऋग्वेद के नासदीय सूक्त ( अष्टक 8, मं० 10 , सू० 129 ) में वर्णन किया गया है कि संसार की उत्पत्ति जल से हुई है , जल का ही एक पर्यायवाची है "नार" | जब शिशु गर्भ में होता है तो उसके जीवन के पोषण के लिए माँ के रक्त से गर्भनाल द्वारा पोषक आहार मिलता है तथा जन्म के पश्चात माँ का स्तनपान शिशु के सर्वांगीण विकास के लिए अमृत समान होता है अतः महादेवी वर्मा जी की लेखनी से उद्भूत पंक्तियां महत्वपूर्ण हैं कि - " नारी केवल मांसपिण्ड की संज्ञा नही है , आदिम काल से लेकर आज विकास पथ पर पुरुष का साथ देकर उसकी जीवन यात्रा को सफल बनाकर उसके अभिशापों को स्वयं झेलकर अपने वरदानों से जीवन को अक्षय शक्ति से भरकर मानवी ने जिस व्यक्तित्व चेतना का विकास किया है , उसी का पर्याय नारी है |"
   यह संसार ही द्वंद्वात्मक , मिथुनजन्य सृष्टि है जिसमें समस्त पदार्थ , स्त्री-पुरुष , शक्ति और सामर्थ्य के रुप विभाजित किये गये हैं , परस्पर दोनों के बीच आकर्षण शक्ति तो संसार का मूलाधार है क्योंकि पुरुषार्थ के चार भागों में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का विधान है तो ऐसे में केवल काम की प्रबलता एवं नारी शक्ति को केवल भोग-विलास की वस्तु समझना क्या  विनाशकारी नही कहा  जा सकता है ?  क्या ये नही लगता कि संयम और संस्कार को यूं ही दरकिनार करके धनलिप्सा, दिखावा, झूठ, स्वार्थ , प्रपंच, ईर्ष्या की प्रबलता में हम अपनी अगली पीढ़ियों को कुंठा की आग में झुलसने की राह दिखाते जा रहे हैं , हम सबको संयम और संस्कार के अमृत-कलश की छलकती बूंदें बनकर अपनी आने वाली पीढ़ियों के साथ मिलकर जीवन-सुधा की खोज़ में वर्तमान से भविष्य की रुपरेखा को आकार देकर इंद्रधनुषी रंग भरने की यात्रा तो तय करनी ही होगी |
------ नीरु ' निरुपमा मिश्रा त्रिवेदी'